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Diya

(अध्याय-1)

बाबा मोहनराम से नन्दू मिलन

एक समय की बात है। राजस्थान के अलवर जिले के तिजारा तहसील के एक गाँव में एक नन्दू नामक ब्राह्मण रहता था, जो कि भगवान श्री कृष्ण का परम भक्त था तथा वह रोजाना मिलकपुर के पर्वतों पर अपनी गाय चराया करता था। एक बार श्री कृष्ण भगवान ने नन्दू की भक्ति से प्रसन्न होकर उसे दर्शन देने का निर्णय लिया और एक लीला रची।

जब नन्दू अपनी गाय चराने जाता था, तो नन्दू की एक काली गाय पहाड़ के ऊपर गुफा में चली जाती थी और जब वह वापस आती, तो उसके थन में दूध नहीं होता था। ये सिलसिला काफी दिनों तक ऐसे ही चलता रहा।

एक रोज़ जब रोजाना की तरह नन्दू, अपनी गाय चराने गया, तो उसकी वह काली गाय गुफा से वापस ही नहीं लौटी। तब नन्दू, गाय की खोज में निकल पड़ा, तो उसे एक पहाड़ी पर साधु तपस्या करते हुए मिले, जिनके चेहरे पर सूर्य के समान तेज था।
नन्दू ने एक पल उस तपस्वी साधू के चेहरे को निहारा और फिर विनम्रता से पूछा, “बाबा आपने मेरी काली गाय कहीं देखी है? वह काफी समय से नहीं मिल रही है।“

इस पर बाबा बोले, “हे! नन्दू, तुम चिन्ता मत करो। तुम्हारी वह गाय वापस आ जाएगी।“ फिर बाबा ने आगे कहा, “नन्दू मैं बहुत भूखा हूँ। तुम मुझे कुछ खाने को दे दो।“
“लेकिन बाबा मेरे पास तो कुछ नहीं है।“ नन्दू ने कहा।

तब बाबा, नन्दू से कहते हैं, “नन्दू तुम अपने घर जाओ, वहाँ दो रोटियाँ रखी है। वही रोटियाँ मेरे लिए ले आओ।“

इतना कहकर बाबा, नन्दू को तीन फालसे देते हुए कहते हैं, “हे! नन्दू, ये फालसे अपने साथ ले जाओ और जहाँ भी ये फालसे गिरें, वहाँ देखना।“

नन्दू, बाबा से फालसे लेकर अपने घर की ओर चल पड़ता है। चलते हुए पहला फालसा खोली व मिलकपुर के बीच गिरता है तथा दूसरा फालसा, मिलकपुर के वहाँ गिरता है, जहाँ आज शिव मन्दिर होता है तथा तीसरा फालसा, मिलकपुर में वहाँ गिरता है, जहाँ आज अखण्ड ज्योत होती है। जब नन्दू घर पहुंचता है, तो देखता है कि सचमुच में बाबा जी के कथनानुसार घर में दो ही रोटियाँ हैं। नन्दू भक्त उन दोनों रोटियों को और साथ में गुड़ लेकर बाबा के पास वापस पहुंचता है और बाबा को रोटियाँ देते हुए बताता है, “बाबा जहाँ पहला फालसा गिरा, वहाँ मुझे एक प्याऊ दिखा। जहाँ दूसरा फालसा गिरा, वहाँ शिवलिंग दिखी और जहाँ तीसरा फालसा गिरा, वहाँ एक ज्योत दिखाई दी।“

तब बाबा बोले, “नन्दू, जब तुम यहां से जाओगे, तो जहाँ तुम्हें पहला फालसा गिरने पर प्याऊ दिखा, वहां प्याऊ बन जायेगा और जहाँ दूसरा फालसा गिरने पर शिवलिंग के दर्शन हुए, वहाँ शिव मन्दिर बन जायेगा और जहां तुम्हें ज्योत दिखाई दी, वहां सदैव अखण्ड ज्योत जलती रहेगी।

इतना सुनकर नन्दू, बाबा से पूछता है कि, “हे! बाबा, आप कौन हैं?“
तब बाबा, नन्दू को बताते हैं कि, “मैं मोहन राम हूँ। तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न होकर तुम्हें दर्शन देने आया हूँ।“ फिर प्रसन्न भाव से नन्दू की ओर देखते हुए “वरदान मांगो नन्दू। बताओ क्या इच्छा है तुम्हारी?“
इस पर नन्दू दोनों हाथ जोड़कर कहता है, “हे प्रभु! मुझे तो केवल आपकी भक्ति चाहिए।“

तब बाबा मोहन राम बड़े ही स्नेह से नन्दू की ओर देखकर उसे वरदान देते हुए कहते हैं, “नन्दू तुम बहुत ही नेक और सच्चे भक्त हो, इसलिए मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि आज से तुम्हारी कही हर वाणी सत्य साबित होगी और तुम्हारे पास जब भी कोई रोगी आये, तो उसे मेरी धूनी की भभूती तथा जलहरी का जल दे देना।“ इतना वरदान देकर बाबा मोहन राम अन्तध्र्यान हो जाते है। प्रथम अध्याय समाप्त हुआ…

बोलो बाबा मोहन राम की जय

Diya

(अध्याय-2)

मेव जाति का गुर्जरो पर अत्याचार व खोली में समाना

एक समय की बात है। राजस्थान के अलवर जिले के तिजारा तहसील में एक गाँव था, जहाँ गुर्जर जाति निवास करती थी तथा उन पर मेव जाति द्वारा बहुत अत्याचार किया जाता था। एक बार गुर्जर गाँव के सरपंच, नन्दू भक्त के पास आए और सारी कहानी सुनाई। तब नन्दू भक्त बाबा मोहन राम से फरियाद करते हैं कि, “हे! बाबा गुर्जर जाति की दुष्टों से रक्षा करो।“
तब बाबा मोहन राम अपने हवा से भी तेज चलने वाले नीले घोडे पर सवार होकर, हाथ में तलवार लेकर सम्पूर्ण मेव जाति का विनाश कर देते हैं और जब वह खोली की तरफ जाते हैं, तो पहाड़ पर उनके घोडे के पैर फस जाते हैं तथा वहाँ से बाबा मोहन राम, खोली में पहुँच कर वहीं समा जाते हैं। उसी दिन से गुर्जर लोग बाबा जी की पूजा करते हंै। द्वितीय अध्याय समाप्त हुआ…

बोलो बाबा मोहन राम की जय

Diya

(अध्याय-3)

भगत शिरोमणि श्री नेतराम जी के बारे में

बाबा मोहन राम के भक्तों में भक्त शिरोमणि नेतराम जी का नाम प्रमुख भक्तों में सम्मान से लिया जाता हैं। भक्त नेतराम खोली वाले के परम् भक्त थे इनके श्रीमुख से निकला हर शब्द अटल सत्य होता था एक बार की बात है। कि भक्त नेतराम बहुत ज्यादा बीमार पड़ गए इनका बहुत जगह इलाज करवाया मगर वह ठीक होने की वजह ज्यादा बीमार होते चले गए। अंत मे इन्हें गुड़गांव के अस्पताल में दाखिल कर दिया गया। वहां डॉक्टर ने उसकी पूरी तरह से जाँच की तो कोई रोग के लक्षण उन्हें नहीं मिले। भक्त जी का एक्षरा लिया गया जब सिविल सर्जन ने उनका एक्सरा देखा तो वह हैरान रह गया। भक्त जी के एक्सरे में श्री कृष्ण जी का मुकुट साफ दिखाई दे रहा था जिस तरह हनुमानजी ने भरी सभा में अपने सीने को चीर कर राम जी की तस्वीर दिखाई थी। इसी तरह नेतराम जी के दिल मे हमेशा बाबा मोहन राम समाया रहता था। जिनका मुकुट एक्सरे में आया था सिविल सर्जन भक्त नेतराम जी के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ाते हुए बोला हे महाराज मैं तो आपको एक आम रोगी समंझ रहा था। आप तो महान पुरुष हो श्री कृष्ण जी आप के दिल में हमेशा निवास करते है। जिस का प्रमाण एक्सरे में आये मुकुट ने दिया है। हे भक्त जी मैं आपको कैसे ठीक कर सकता हूँ। आप तो खुद ही हर रोग को ठीक करने में सक्षम हैं। उनके शिष्य व परिवार वाले नेतराम जी को घर ले आये मन्दिर में आकर उन्होंने बाबा के धूने की भबूती ली और चरणामृत पिया जिसे पीते ही वह तुरन्त ठीक हो गए। सभी बाबा के चमत्कार को देखकर नतमस्तक हो गए। प्रिय भक्तों भक्त नेतराम ने पूरी जिंदगी बाबा के नाम पर अर्पण कर दी इनके सेकड़ो शिष्य है जो बाबा की कृपा से दुखियों के दुःख दूर करते है। भक्त नेतराम अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर दिल्ली के एक बड़े अस्पताल में दाखिल थे इधर मिलकपुर मन्दिर में उनके सेकड़ो जाती कीर्तन कर रहे थे अनेको भक्त बैठे थे जो अपने गुरु नेतराम जी के विषय में बीमारी की चर्चा कर रहे थे कुछ कह रहे थे भक्त जी ठीक हो जायेंगे चिन्ता की कोई बात नही है। कुछ कह रहे थे कि भक्त जी हमे छोड़कर जाने ही वाले हैं। क्योंकि आना जाना तो संसार का नियम है। जो इस दुनिया मे आया है उसे एक ना एक दिन जाना ही पड़ेगा ऐसी ही बात भक्तों के बीच हो रही थी तभी बाबा के एक प्रसिद्ध भक्त चंदी टिकरी वाले को बहुत जोर की महर हुई वह गरजता हुआ सा बोला अरे भक्तों मन्दिर की धजा झुका दो आज मेरा भक्त मुझमे सदा-सदा के लिए लीन हो गया है। इस पुकार को सुनकर सभी समंझ गए कि हमारे ह्रदय सम्राट भक्त शिरोमणि नेतराम जी का स्वर्गवास हो गया है। मन्दिर की सारी धजा झुका दी गई। दिन निकलने से पहले तो भक्त जी का पार्थिव शरीर मन्दिर में आ गया उनके अंतिम दर्शनों के लिए लाखों लोग उमड़ पड़े। आज चाहे भक्त नेतराम जी हमारे बीच मे नही रहे मगर जब तक बाबा मोहन राम का नाम रहेगा तब तक भक्त नेतराम जी को भी इनके प्रमुख भक्त के रूप में श्रद्धा के साथ याद किया जायेगा । तृतीय अध्याय समाप्त हुआ…

बोलो बाबा मोहन राम की जय

Diya

(अध्याय-4)

बाबा कोरा की गददी व चमत्कार

शिरोमणि भक्त बाबा कोरा का जन्म लालू भक्त के परिवार में सन् 1867 में राजस्थान के अलवर जिले की तीजारा तहशील के गाँव मिलकपुर में हुआ था। इनके दादा जी हरनारायन भक्त जी व पिता स्वरूपा भक्त जी थे। इनकी माता का नाम मोरो था। ये शुरू से ही बाबा मोहन राम की भक्ति में लीन थे। बाबा जी की ऐसी कृपा हुई। और इन्हो पर भी बाबा अप्रत्यक्ष रूप (महर के रुप में) से आने लगे। तथा इनके मुख से निकली हर बात सत्य होती थी। इनके सेंकडो भक्त लोगो के संकट दुर कर रहे है। बाबा कोरा की कई कथाए ऐसी सामने आती है – 


1. एक बार एक औरत अपने पति के साथ खोली बाबा मोहन राम के दर्शन को आती है जब वह खोली की सीढीयो पर होती है तब एक चोर उस औरत के गले की चेन चोरी लेता है। तो वह औरत बहुत ही दुखी होती है। और रोते-रोते कोरा भक्त जी के पास आ जाती है। तो वह कोरा भक्त जी को सारी बात बाताती है। तो कोरा भक्त जी उससे कहते है। कि तुम चिन्ता मत करो वो चोर यही आएगा तुम यही बैठ जाओ। तथा बाबा का ऐसा चमत्कार होता है की वह चोर अन्धा हो जाता है। और भटकते भटकते कोरा भक्त जी की गददी के सामने खडा होकर बोलता है कि मैने किसी की चेन चोरी की है किसी की हो तो ले लो। मै अन्धा हो गया हूँ।तब कोरा भक्त उस औरत को कहते है की जा वो देख आ गया चोर तब औरत अपनी चेन ले लेती है। तब वो चोर कोरा भक्त जी के पैरो में गिर जाता है। और माफी माँगते हुए कहता है बाबा मेरे से गलती हो गई मुझे क्षमा कर दो। तब बाबा कोरा उसको निराकार जोत के सामने बैठने को बोलते है। और बाबा की कृपा से उस चोर के नेत्र की ज्योती वापस आ जाती है और वो मोहन राम की और कोरा भक्त की जय जयकार करने लग जाता है

 

2. एक बार एक काकोडी गाँव में रहने वाले पंण्डित सत्य प्रकाश पहली बार खोली के दर्शन करने गए थे। तथा उन्होने वहाँ से शवा रुपीये का प्रसाद लिया और खोली में चले गए। वहाँ जाकर देखा कि वहाँ केवल ज्योत जली हुई थी। तो उन्होने सोचा यहाँ जोत पर प्रसाद चढाने से क्या फायदा अपने बच्चो के लिए लेकर चलता हूँ। और उन्होने वो प्रसाद थेले में रख लिया। और मिलकपुर के मन्दिर में कोरा भक्त जी के चोपाड पर आ कर बैठ गए। तब ही कोरा भक्त जी पर बाबा की महर हो जाती है। तो बाबा की पुकार कि एक पंण्डित जी काकोडी गाँव से आए है। वो आगे आ जाए। तब सत्य प्रकाश जी आगे जाकर खडे हो। और कोरा भक्त जी पुछते है। कि प्रसाद क्यो नही चढाया। तो सत्य प्रकाश जी कहते है की यहाँ केवल जोत है। इससे अच्छा तो में अपने बच्चो को खिलाऊगाँ। तो कोरा भक्त जी बोले की तुमको कैसे यकिन आएगा तो सत्य प्रकाश जी कहते है। ये जो महर कोरा भक्त पर है वो मेरे पर हो जाए तब मै मानुगा वरना यहाँ कुछ नही है। तो कोरा भक्त जी कहते है कि जा 40 दिन के व्रत कर तेरे पर महर हो जाएगी। तब सत्य प्रकाश की सच्चे दिल से बाबा की भक्ति करते है। और बाबा की कृपा से 21वे दिन उन पर वही महर हो जाती है जो कोरा भक्त जी पर होती थी। और वह वापस खोली आते है। और बाबा का जागरण व भंडारा कराते है और आनेको दुखीयो के कष्ट दूर करते है। और बाबा का और कोरा भक्त जी का गुनगान करते है।


ऐसे बहुत से चमत्कार कोरा भक्त जी ने किए और 143 साल की उम्र में नेत्रहीन हो गए। और वो अपने भक्तो को स्पर्श मात्र से पहचान जाते थे। और 150 वर्ष की उम्र में 21 फरवरी 2017 दिन मंगलवार को आपने प्रिय बैटे जयचन्द भक्त जी को गददी सौप कर हमे छोडकर सदैव के लिए बाबा मोहन राम मे समा गए। चतुर्थ अध्याय समाप्त हुआ…

बोलो बाबा मोहन राम की जय

Diya

(अध्याय-5)

बाबा की खोली की व्याख्या

जैसा की पीछले अध्यायो में आपने पढा है की बाबा मोहन राम के चमत्कार बहुत है। अब आपको बाबा की खोली की प्रकरमा के बारे में बाताते है। जब बाबा मोहन राम ने नन्दु भक्त को दर्शन दिए तब उन्होने कहा था की नन्दू जब तक मेरे भक्त मिलकपुर के मन्दिर के दर्शन नही करेगें, तब तक मेरी प्रकरमा अधुरी मानी जाएगी। इसलिए सबसे पहले हम मिलकपुर धाम पहुचेगे। फिर वहाँ से खोली तक नंगे पैर चल कर जाएगे और वहाँ दर्शन करके पहाडो को मध्य बनी गुफा जहाँ बाबा तपस्या किया करते थे वहाँ जाएगे। उसके बाद बाबा का जोहड जहाँ बाबा ने स्नान किया वहाँ से होते हुए उस स्थान पर पहुचेगे। जहाँ बाबा के घोडे के खुर जमीन में फस गए थे। जिनको बाबा के घोडे के खुर बोलते है। वहाँ के दर्शन करके। नीचे नीले घोडे की प्रकरमा करके मिलकपुर बापस आना होता है। और वहाँ दर्शन करके गुरु जी से आज्ञा लेकर अपने घर बापस चले जाते है। कथा समाप्त हुई।

बोलो बाबा मोहन राम की जय