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	<title>Mohan Ram Baba</title>
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	<description>ॐ मोहन राम नमः</description>
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		<title>राम कथा लव और कुश के श्री मुख से</title>
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		<dc:creator><![CDATA[jbmr]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 17 Jun 2020 14:55:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[ram katha]]></category>
		<category><![CDATA[ram katha by love kush]]></category>
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		<category><![CDATA[shri ram katha]]></category>
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					<description><![CDATA[हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की, ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की, जम्बुद्वीपे, भरत खंडे. आर्यावर्ते, भारतवर्षे,इक नगरी है विख्यात अयोध्या नाम की,यही जन्म भूमि है परम पूज्य श्री राम की,हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,ये रामायण है &#8230;]]></description>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="1024" height="683" src="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-1024x683.jpg" alt="" class="wp-image-961" srcset="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-1024x683.jpg 1024w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-300x200.jpg 300w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-768x512.jpg 768w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-1536x1024.jpg 1536w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Ram-Darbar-2048x1365.jpg 2048w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p class="has-text-align-center">हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,<br>हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,</p>



<p class="has-text-align-center">ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,</p>



<p class="has-text-align-center">जम्बुद्वीपे, भरत खंडे. आर्यावर्ते, भारतवर्षे,<br>इक नगरी है विख्यात अयोध्या नाम की,<br>यही जन्म भूमि है परम पूज्य श्री राम की,<br>हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,<br>ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,<br>ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,</p>



<p class="has-text-align-center">रघुकुल के राजा धर्मात्मा, चक्रवर्ती दशरथ पुण्यात्मा,<br>संतति हेतु यज्ञ करवाया, धर्म यज्ञ का शुभ फल पाया,<br>नृप घर जन्मे चार कुमारा, रघुकुल दीप जगत आधारा,<br>चारों भ्रातों के शुभ नामा, भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण रामा,</p>



<p class="has-text-align-center">गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल जाके, अल्प काल विद्या सब पाके,<br>पूरण हुयी शिक्षा, रघुवर पूरण काम की,<br>हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,<br>ये रामायण है पुण्य कथा श्री राम की,</p>



<p class="has-text-align-center">मृदु स्वर, कोमल भावना, रोचक प्रस्तुति ढंग,<br>इक इक कर वर्णन करें, लव कुश राम प्रसंग,<br>विश्वामित्र महामुनि राई, तिनके संग चले दोउ भाई,<br>कैसे राम ताड़का मारी, कैसे नाथ अहिल्या तारी,</p>



<p class="has-text-align-center">मुनिवर विश्वामित्र तब, संग ले लक्ष्मण राम,<br>सिया स्वयंवर देखने, पहुंचे मिथिला धाम,</p>



<p class="has-text-align-center">जनकपुर उत्सव है भारी,<br>जनकपुर उत्सव है भारी,<br>अपने वर का चयन करेगी सीता सुकुमारी,<br>जनकपुर उत्सव है भारी,</p>



<p class="has-text-align-center">जनक राज का कठिन प्रण, सुनो सुनो सब कोई,<br>जो तोडे शिव धनुष को, सो सीता पति होई,</p>



<p class="has-text-align-center">को तोरी शिव धनुष कठोर, सबकी दृष्टि राम की ओर,<br>राम विनय गुण के अवतार, गुरुवार की आज्ञा शिरधार,<br>सहज भाव से शिव धनु तोड़ा, जनकसुता संग नाता जोड़ा,<br>रघुवर जैसा और न कोई, सीता की समता नही होई,<br>दोउ करें पराजित कांति कोटि रति काम की,<br>हम कथा सुनाते राम सकल गुणधाम की,<br>ये रामायण है पुण्य कथा सिया राम की,</p>



<p class="has-text-align-center">सब पर शब्द मोहिनी डारी, मन्त्र मुग्ध भये सब नर नारी,<br>यूँ दिन रैन जात हैं बीते, लव कुश नें सबके मन जीते,</p>



<p class="has-text-align-center">वन गमन, सीता हरण, हनुमत मिलन, लंका दहन, रावण मरण, अयोध्या पुनरागमन.</p>



<p class="has-text-align-center">सविस्तार सब कथा सुनाई, राजा राम भये रघुराई,<br>राम राज आयो सुख दाई, सुख समृद्धि श्री घर घर आई,</p>



<p class="has-text-align-center">काल चक्र नें घटना क्रम में ऐसा चक्र चलाया,<br>राम सिया के जीवन में फिर घोर अँधेरा छाया,</p>



<p class="has-text-align-center">अवध में ऐसा, ऐसा इक दिन आया,<br>निष्कलंक सीता पे प्रजा नें मिथ्या दोष लगाया,<br>अवध में ऐसा, ऐसा इक दिन आया,</p>



<p class="has-text-align-center">चल दी सिया जब तोड़ कर सब नेह नाते मोह के,<br>पाषण हृदयों में न अंगारे जगे विद्रोह के,</p>



<p class="has-text-align-center">ममतामयी माँओं के आँचल भी सिमट कर रह गए,<br>गुरुदेव ज्ञान और नीति के सागर भी घट कर रह गए,</p>



<p class="has-text-align-center">न रघुकुल न रघुकुलनायक, कोई न सिय का हुआ सहायक,</p>



<p class="has-text-align-center">मानवता को खो बैठे जब, सभ्य नगर के वासी,<br>तब सीता को हुआ सहायक, वन का इक सन्यासी,</p>



<p class="has-text-align-center">उन ऋषि परम उदार का वाल्मीकि शुभ नाम,<br>सीता को आश्रय दिया ले आए निज धाम,</p>



<p class="has-text-align-center">रघुकुल में कुलदीप जलाए, राम के दो सुत सिय नें जाए,</p>



<p class="has-text-align-center">श्रोतागण, जो एक राजा की पुत्री है, एक राजा की पुत्रवधू है, और एक चक्रवर्ती राजा की पत्नी है, वही महारानी सीता वनवास के दुखों में अपने दिन कैसे काटती है. अपने कुल के गौरव और स्वाभिमान के रक्षा करते हुए, किसी से सहायता मांगे बिना कैसे अपना काम वो स्वयं करती है, स्वयं वन से लकड़ी काटती है, स्वयं अपना धान कूटती है, स्वयं अपनी चक्की पीसती है, और अपनी संतान को स्वावलंबी बनने की शिक्षा कैसे देती है अब उसकी एक करुण झांकी देखिये;</p>



<p class="has-text-align-center">जनक दुलारी कुलवधू दशरथजी की,<br>राजरानी होके दिन वन में बिताती है,<br>रहते थे घेरे जिसे दास दासी आठों याम,<br>दासी बनी अपनी उदासी को छिपती है,<br>धरम प्रवीना सती, परम कुलीना,<br>सब विधि दोष हीना जीना दुःख में सिखाती है,<br>जगमाता हरिप्रिया लक्ष्मी स्वरूपा सिया,<br>कूटती है धान, भोज स्वयं बनती है,<br>कठिन कुल्हाडी लेके लकडियाँ काटती है,<br>करम लिखे को पर काट नही पाती है,<br>फूल भी उठाना भारी जिस सुकुमारी को था,<br>दुःख भरे जीवन का बोझ वो उठाती है,<br>अर्धांगिनी रघुवीर की वो धर धीर,<br>भरती है नीर, नीर नैन में न लाती है,<br>जिसकी प्रजा के अपवादों के कुचक्र में वो,<br>पीसती है चाकी स्वाभिमान को बचाती है,<br>पालती है बच्चों को वो कर्म योगिनी की भाँती,<br>स्वाभिमानी, स्वावलंबी, सबल बनाती है,<br>ऐसी सीता माता की परीक्षा लेते दुःख देते,<br>निठुर नियति को दया भी नही आती है,</p>



<p class="has-text-align-center">उस दुखिया के राज दुलारे, हम ही सुत श्री राम तिहारे,<br>सीता मां की आँख के तारे, लव कुश हैं पितु नाम हमारे,<br>हे पितु, भाग्य हमारे जागे, राम कथा कही राम के आगे.</p>
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		<title>दोज का मेला स्थगित रहेगा।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[jbmr]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 04 Jun 2020 08:15:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[doj ka mela]]></category>
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					<description><![CDATA[मोहन सेना संगठन की सूचना = ट्रस्ट बाबा मोहन राम काली खोली वाला, मिलकपुर गुर्जर जिला &#8211; अलवर में प्रत्येक माह आयोजित होने वाला दोज का मेला (07/06/2020) को कोरोना महामारी के चलते पूर्व की तरह स्थगित कर दिया गया है।केन्द्रीय सरकार के निर्देशानुसार 08/06/2020 के बाद खोला जाएगा। परन्तु राज्य सरकार ने अभी स्वीकृति &#8230;]]></description>
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<p>मोहन सेना संगठन की सूचना =</p>



<p>ट्रस्ट बाबा मोहन राम काली खोली वाला, मिलकपुर गुर्जर जिला &#8211; अलवर में प्रत्येक माह आयोजित होने वाला दोज का मेला (07/06/2020) को कोरोना महामारी के चलते पूर्व की तरह स्थगित कर दिया गया है।<br>केन्द्रीय सरकार के निर्देशानुसार 08/06/2020 के बाद खोला जाएगा। परन्तु राज्य सरकार ने अभी स्वीकृति नही दी। इसीलिए ट्रस्ट प्रबन्ध कमेटी के द्वारा मन्दिर को जनहित में नही खोलने का निर्णय लिया गया है।</p>



<p>खोली के लाइव दर्शन के लिए <img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f447-1f3fb.png" alt="👇🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f447-1f3fb.png" alt="👇🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f447-1f3fb.png" alt="👇🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" /> यहाँ दबाएं।</p>



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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="697" height="1024" src="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice-697x1024.jpg" alt="" class="wp-image-953" srcset="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice-697x1024.jpg 697w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice-204x300.jpg 204w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice-768x1128.jpg 768w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice-1046x1536.jpg 1046w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/Kali-Kholi-Notice.jpg 1372w" sizes="(max-width: 697px) 100vw, 697px" /></figure>
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		<title>निर्जला एकादशी का महत्त्व</title>
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		<dc:creator><![CDATA[jbmr]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 02 Jun 2020 04:46:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[ekadashi vrat]]></category>
		<category><![CDATA[ekadashi vrat katha]]></category>
		<category><![CDATA[nirjla ekadashi ka mehtatv]]></category>
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					<description><![CDATA[एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी का &#8230;]]></description>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="682" src="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282-1024x682.jpg" alt="religion, faith, pray" class="wp-image-888" srcset="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282-1024x682.jpg 1024w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282-300x200.jpg 300w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282-768x512.jpg 768w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282-310x205.jpg 310w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/06/religion-faith-pray-3443282.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है।</p>



<p>निर्जला एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख़ भोग और अन्त में मोक्ष कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।</p>



<p><strong>!! निर्जला एकादशी व्रत कथा !!</strong></p>



<p>निर्जला एकादशी व्रत का पौराणिक महत्त्व और व्याख्यान भी कम रोचक नहीं है। जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था।</p>



<p>युधिष्ठिर ने कहा: जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।</p>



<p>भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन्! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|</p>



<p>तब वेदव्यासजी कहने लगे: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।</p>



<p>यह सुनकर भीमसेन बोले: परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।</p>



<p>भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा: यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।</p>



<p>भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है।</p>



<p>इसलिए महामुनि! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।</p>



<p>व्यासजी ने कहा: भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है।</p>



<p>एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करें। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे।</p>



<p>वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।</p>



<p>एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं।</p>



<p>अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है।</p>



<p>मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।</p>



<p>जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।</p>



<p>कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो: उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है।…</p>



<p>पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस निर्जला एकादशी का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है।</p>



<p>निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर</p>



<p>आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है।</p>



<p>पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा। द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।</p>



<p>संसारसागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।</p>



<p>भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है।…</p>



<p>तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में पाण्डव द्वादशी के नाम से विख्यात हुई।</p>



<p>निर्जला एकादशी के बाद कृष्ण पक्ष में आने वाली अगली एकादशी योगिनी एकादशी है।</p>
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		<title>तीन गुरु:- चोर, कुत्ता और छोटा बच्चा</title>
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		<pubDate>Sat, 30 May 2020 19:48:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है? महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए &#8230;]]></description>
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<p>बहुत समय पहले की बात है, किसी नगर में एक बेहद प्रभावशाली महंत रहते थे। उन के पास शिक्षा लेने हेतु दूर दूर से शिष्य आते थे। एक दिन एक शिष्य ने महंत से सवाल किया, स्वामीजी आपके गुरु कौन है? आपने किस गुरु से शिक्षा प्राप्त की है? महंत शिष्य का सवाल सुन मुस्कुराए और बोले, मेरे हजारो गुरु हैं! यदि मै उनके नाम गिनाने बैठ जाऊ तो शायद महीनो लग जाए। लेकिन फिर भी मै अपने तीन गुरुओ के बारे मे तुम्हे जरुर बताऊंगा।</p>



<p><br><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f449-1f3fb.png" alt="👉🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" />मेरा पहला गुरु था एक चोर।<br>एक बार में रास्ता भटक गया था और जब दूर किसी गाव में पंहुचा तो बहुत देर हो गयी थी। सब दुकाने और घर बंद हो चुके थे। लेकिन आख़िरकार मुझे एक आदमी मिला जो एक दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। मैने उससे पूछा कि मै कहा ठहर सकता हूं, तो वह बोला की आधी रात गए इस समय आपको कहीं कोई भी आसरा मिलना बहुत मुश्किल होंगा, लेकिन आप चाहे तो मेरे साथ आज कि रात ठहर सकते हो। मै एक चोर हु और अगर एक चोर के साथ रहने में आपको कोई परेशानी नहीं होंगी तो आप मेरे साथ रह सकते है।<br>वह इतना प्यारा आदमी था कि मै उसके साथ एक रात कि जगह एक महीने तक रह गया! वह हर रात मुझे कहता कि मै अपने काम पर जाता हूं, आप आराम करो, प्रार्थना करो। जब वह काम से आता तो मै उससे पूछता की कुछ मिला तुम्हे? तो वह कहता की आज तो कुछ नहीं मिला पर अगर भगवान ने चाहा तो जल्द ही जरुर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश और उदास नहीं होता था, और हमेशा मस्त रहता था। कुछ दिन बाद मैं उसको धन्यवाद करके वापस आपने घर आ गया|<br>जब मुझे ध्यान करते हुए सालों-साल बीत गए थे और कुछ भी नहीं हो रहा था तो कई बार ऐसे क्षण आते थे कि मैं बिलकुल हताश और निराश होकर साधना छोड़ लेने की ठान लेता था। और तब अचानक मुझे उस चोर की याद आती जो रोज कहता था कि भगवान ने चाहा तो जल्द ही कुछ जरुर मिलेगा और इस तरह मैं हमेशा अपना ध्यान लगता और साधना में लीन रहता|</p>



<p><br><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f449-1f3fb.png" alt="👉🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" />मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता था।<br>एक बार बहुत गर्मी वाले दिनों में, मै कही जा रहा था और मैं बहुत प्यासा था और पानी के तलाश में घूम रहा था कि सामने से एक कुत्ता दौड़ता हुआ आया। वह भी बहुत प्यासा था। पास ही एक नदी थी। उस कुत्ते ने आगे जाकर नदी में झांका तो उसे एक और कुत्ता पानी में नजर आया जो की उसकी अपनी ही परछाई थी। कुत्ता उसे देख बहुत डर गया। वह परछाई को देखकर भौकता और पीछे हट जाता, लेकिन बहुत प्यास लगने के कारण वह वापस पानी के पास लौट आता। अंततः अपने डर के बावजूद वह नदी में कूद पड़ा और उसके कूदते ही वह परछाई भी गायब हो गई। उस कुत्ते के इस साहस को देख मुझे एक बहुत बड़ी सिख मिल गई। अपने डर के बावजूद व्यक्ति को छलांग लगा लेनी होती है। सफलता उसे ही मिलती है जो व्यक्ति डर का साहस से मुकाबला करता है।</p>



<p><br><img src="https://s.w.org/images/core/emoji/14.0.0/72x72/1f449-1f3fb.png" alt="👉🏻" class="wp-smiley" style="height: 1em; max-height: 1em;" />मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है।<br>मै एक गांव से गुजर रहा था कि मैंने देखा एक छोटा बच्चा एक जलती हुई मोमबत्ती ले जा रहा था।वह पास के किसी मंदिर में मोमबत्ती रखने जा रहा था। मजाक में ही मैंने उससे पूछा की क्या यह मोमबत्ती तुमने जलाई है? वह बोला, जी मैंने ही जलाई है। तो मैंने उससे कहा की एक क्षण था जब यह मोमबत्ती बुझी हुई थी और फिर एक क्षण आया जब यह मोमबत्ती जल गई। क्या तुम मुझे वह स्त्रोत दिखा सकते हो जहा से वह ज्योति आई?<br>वह बच्चा हँसा और मोमबत्ती को फूंख मारकर बुझाते हुए बोला,अब आपने ज्योति को जाते हुए देखा है। कहाँ गई वह? आप ही मुझे बताइए।<br>मेरा अहंकार चकनाचूर हो गया, मेरा ज्ञान जाता रहा। और उस क्षण मुझे अपनी ही मूढ़ता का एहसास हुआ। तब से मैंने कोरे ज्ञान से हाथ धो लिए।<br>शिष्य होने का अर्थ क्या है? शिष्य होने का अर्थ है पुरे अस्तित्व के प्रति खुले होना। हर समय हर ओर से सीखने को तैयार रहना। कभी किसी कि बात का बूरा नहि मानना चाहिए, किसी भी इंसान कि कही हुइ बात को ठंडे दिमाग से एकांत में बैठकर सोचना चाहिए के उसने क्या-क्या कहा और क्यों कहा तब उसकी कही बातों से अपनी कि हुई गलतियों को समझे और अपनी कमियों को दूर् करे|</p>



<p><br>जीवन का हर क्षण, हमें कुछ न कुछ सीखने का मौका देता है।<br>हमें जीवन में हमेशा एक शिष्य बनकर अच्छी बातो को सीखते रहना चाहिए। यह जीवन हमें आये दिन किसी न किसी रूप में किसी गुरु से मिलाता रहता है, यह हम पर निर्भर करता है कि क्या हम उस महंत की तरह एक शिष्य बनकर उस गुरु से मिलने वाली शिक्षा को ग्रहण कर पा रहे हैं की नही।</p>
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		<title>5 जून से 5 जुलाई 2020 के बीच मे तीन ग्रहण है।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[jbmr]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 May 2020 20:02:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[एक महीने में तीन ग्रहणदो चंद्र ग्रहणएक सूर्य ग्रहण जब कभी एक महीने में तीन से ज्यादा ग्रहण आ जायेतो एक चिंता का विषय बनता है 5 जून 2020 चंद्रग्रहणप्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, &#8230;]]></description>
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<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="682" src="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021-1024x682.jpg" alt="fantasy, sky, eclipse" class="wp-image-743" srcset="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021-1024x682.jpg 1024w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021-300x200.jpg 300w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021-768x512.jpg 768w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021-310x205.jpg 310w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/fantasy-sky-eclipse-4566021.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>एक महीने में तीन ग्रहण<br>दो चंद्र ग्रहण<br>एक सूर्य ग्रहण</p>



<p>जब कभी एक महीने में तीन से ज्यादा ग्रहण आ जाये<br>तो एक चिंता का विषय बनता है</p>



<p>5 जून 2020 चंद्रग्रहण<br>प्रारंभ रात 11:15 मिनिट समाप्ति 6 जून सुबह 2:34 चंद्र ग्रहण जिसमे शुक्र वक्री और अस्त रहेगा गुरु शनि वक्री रहेंगे तो तीन ग्रह वक्री रहेंगे, जिसके कारण जिसके प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था पर होगा। शेयर बाजार से जुड़े हुए लोग सावधान रहें। यह ग्रहण वृश्चिक राशि पर बहोत बुरा प्रभाव डालेगा। किसी ख्यातिप्राप्त व्यक्ति की रहस्यात्मक मौत।<br>परिवार वालो के साथ वाद विवाद का सामना करना पड़ेगा तो वृश्चिक राशिवाले सावधान।</p>



<p>21 जून 2020 सूर्य ग्रहण<br>एक साथ छ ग्रह वक्री रहेंगे बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु यह छह ग्रह 21 जून 2020 को वक्री रहेंगे। इन छह ग्रह का वक्री होना यानी एक बहोत बड़ा तहलका मचाने वाला है।</p>



<p>5 जुलाई 2020 चंद्रग्रहण एक बहुत बड़ा परिवर्तन<br>मंगल का राशि परिवर्तन<br>सूर्य का राशि परिवर्तन<br>गुरु धन राशि मे वापस, लेकिन वक्री रहेंगे।<br>शुक्र मार्गी<br>प्राकृतिक आपदाएं आयेगी।<br>विश्व युद्ध होगा वैश्विक शक्तियां लड़ने को हावी होगी।<br>किसी ख्यातिप्राप्त यशस्वी कीर्तिमान राजनीति नेता की हत्या होगी कुछ जगह पर आपसी लड़ाईया होगी। जल प्रलय का खतरा हम सभी पे मंडरा रहा है।</p>



<p>5 जून को चंद्र ग्रहण<br>21 जून को सूर्य ग्रहण<br>5 जुलाई को चंद्र ग्रहण</p>



<p>यह तीन ग्रहण के कारण उथल-पुथल मच जायेगी<br>मांसाहार का त्याग करें, अन्यथा भयकर परिणाम।</p>
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		<title>अयोध्या में भगवान राम के मंदिर की पहली ईंट रखी गयी है।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[jbmr]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 27 May 2020 19:29:12 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
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					<description><![CDATA[राम मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हो गया है.दिनांक &#8211; 26 मई 2020दिन &#8211; मंगलवारविक्रम संवत &#8211; 2077शक संवत &#8211; 1942अयन &#8211; उत्तरायणऋतु &#8211; ग्रीष्ममास &#8211; ज्येष्ठपक्ष &#8211; शुक्लतिथि &#8211; रात्रि 01:09 तक चतुर्थीनक्षत्र &#8211; सुबह 07:03 से पुनर्वसुयोग &#8211; रात्रि 03:54 तक गण्डव्रत पर्व विवरण &#8211; मंगलवारी चतुर्थी नब्बे का वह दौर याद आता है। &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="467" src="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/bagan-myanmar-temple-701006-1024x467.jpg" alt="bagan, myanmar, temple" class="wp-image-737" srcset="https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/bagan-myanmar-temple-701006-1024x467.jpg 1024w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/bagan-myanmar-temple-701006-300x137.jpg 300w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/bagan-myanmar-temple-701006-768x350.jpg 768w, https://mohanrambaba.com/wp-content/uploads/2020/05/bagan-myanmar-temple-701006.jpg 1280w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /><figcaption> </figcaption></figure>



<p>राम मंदिर का निर्माण प्रारम्भ हो गया है.<br>दिनांक &#8211; 26 मई 2020<br>दिन &#8211; मंगलवार<br>विक्रम संवत &#8211; 2077<br>शक संवत &#8211; 1942<br>अयन &#8211; उत्तरायण<br>ऋतु &#8211; ग्रीष्म<br>मास &#8211; ज्येष्ठ<br>पक्ष &#8211; शुक्ल<br>तिथि &#8211; रात्रि 01:09 तक चतुर्थी<br>नक्षत्र &#8211; सुबह 07:03 से पुनर्वसु<br>योग &#8211; रात्रि 03:54 तक गण्ड<br>व्रत पर्व विवरण &#8211; मंगलवारी चतुर्थी</p>



<p>नब्बे का वह दौर याद आता है। लाखों लोग, दोगुनी आंखे, राम नाम की धूम, लाखों कलेजों की उम्मीदें, बन्दूक की गोलियां, रक्त, हाहाकार, मृत्यु, शान्ति… प्रलय के बाद की शान्ति केवल सनातन भाव जो जन्म देती है। पीड़ा की कोख से ही देवत्व जन्म लेता है।</p>



<p>अयोध्या का मन्दिर इस बात के लिए भी विश्व में अनूठा होगा कि उसके लिए प्रजा ने पाँच शताब्दियों तक लड़ाई लड़ी है। इसके लिए असँख्य बार, असँख्य बीरों ने धर्म के हवनकुण्ड में अपने जीवन की आहुति दी है… बार बार पराजित हुए, गिरे, पर फिर उठ कर खड़े हुए और लड़े… और अंततः जीते…</p>



<p>अयोध्या ने सिद्ध किया है कि धर्म की लड़ाइयां पाँच सौ वर्षों के बाद भी जीती जा सकती हैं, बस अपने मार्ग पर चलते रहना है। आज के समय में किसी क्षणिक पराजय के बाद ही लोग हतोत्साहित हो कर विलाप करने लगते हैं कि &#8216;सब समाप्त हो गया, हमें कोई बचा नहीं सकता…&#8217;</p>



<p>अब ऐसे समय में अयोध्या का मन्दिर ऊर्जा देने का काम करेगा कि हम पराजित नहीं हो सकते… अंत में धर्म ही जीतेगा। जो खतरे में आ जाय वह धर्म नहीं हो सकता। धर्म न संकट में पड़ता है, न समाप्त होता है।</p>



<p>नियति का खेल बड़ा मनोरंजक होता है। ध्यान से देखिये समय ने कितना अद्भुत संयोजन किया है। महाराज हेमचंद्र विक्रमादित्य (१५५६ ई) के बाद सन २०१४ में पहली बार भारत की केंद्रीय सत्ता पर कोई ऐसा व्यक्ति पहुँचता है, जिसे स्वयं को हिन्दू कहने में लज्जा नहीं आती। वह निकलता है तो भगवान शिव की नगरी बनारस से…वह तिलक लगाता है, भगवा पहनता है… उसके दो वर्षों बाद ही समय उत्तर प्रदेश के सिंहासन पर एक साधु को बैठाता है। मुझे लगता है भारत में किसी साधु के राजा होने की यह पहली ही घटना होगी…</p>



<p>साधु भी वे, जिनकी गद्दी ने राममन्दिर के लिए लड़ी गयी लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्षों से जातियों के नाम पर टूटी जनता धर्म के नाम पर एक साथ खड़ी होती है, और तब आता है सन 2020… अचानक सब कुछ आसान लगने लगता है। दोनों पक्ष ही कहने लगते हैं कि मंदिर बनना चाहिए… और…</p>



<p>कब क्या होना है और किसके हाथों होना है, यह समय तक कर के बैठा है। समय ने तय किया था कि मन्दिर की ईंट किसी नेता, किसी राजा के हाथों नहीं बल्कि एक सन्त के हाथों रखी जायेगी। वही हुआ… है न अद्भुत?</p>



<p>वर्तमान भारत को याद है कि दो हजार वर्ष पूर्व महाराज विक्रमादित्य ने अयोध्या का पुनरुद्धार किया था, और भव्य मंदिर बनवाया था। भारत को यह भी याद है उस प्राचीन मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कनौज नरेश महाराज विजयचन्द्र ने कराया था। भविष्य का भारत भी पूरी श्रद्धा के साथ स्मरण रखेगा कि आधुनिक युग में मन्दिर का निर्माण गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जी महाराज के काल में हुआ था। समय ने योगी बाबा को सहस्त्राब्दियों तक के लिए स्थापित कर दिया है/अमर कर दिया है।</p>



<p>वे असँख्य लोग जिन्होंने आज का दिन दिखाने के लिए अपनी आहुति दी थी, उनको सादर नमन। हमें तो उन सब के नाम भी याद नहीं। नाम याद है केवल दो कोठारी भाइयों का… वे दोनों बलिदानी उन असँख्य बलिदानियों के प्रतिनिधि के रूप में याद किये जायेंगे, पूजे जाएंगे।</p>



<p>मुझे लगता है उन असँख्य वीरों की याद में वहीं कहीं एक छोटा सा मन्दिर भी बनना चाहिए, ताकि भविष्य उन नव-दधिचियों को प्रणाम कर सके…</p>
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